हलाल अर्थव्यवस्था से तथाकथित हिंदूवादी नेता परेशान क्यों ?

टवीटर पर एक ट्रेंड पिछले कई हफ्तों से चल रहा था , अभी भी इक्का दुक्का खबरे, हलाल के बढ़ते हुए सर्टिफिकेशन पर आपके पास आ ही जाती होगी। यंहा तक की रामदेव बाबा को भी अपने पैकेट पर हलाल का सर्टिफिकेट लिखना पड़ता है। इस्लाम धर्म में हलाल का अर्थ है खाने की वो वस्तुए जिन की इजाजत शरीयत और क़ुरान के अनुसार है।

इस्लाम धर्म के मानने और इसका पालन करने वाले लोगो को देखे तो ये एक बड़ा मार्किट है, और यही कारण है की परम् भौतिकवाद के वातावरण में मार्किट को इस्लाम के रीती रिवाजो के साथ झुकना पड़ रहा है। जब किसी धर्म के लोग अपने शाश्त्रो के अनुसार चलते है तो मार्किट को भी अपने को उसी के अनुसार चलाना पड़ता है। लेकिन इसको देख कर कुछ हिन्दुत्त्ववादियों का हृदये भयग्रस्त हो गया है। सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के नेता सुभ्रमण्यम स्वामी ने कहा है की कम्पनीज को अब अपने पैकेट्स पर धार्मिक शब्द भी लिखना चाहिए। जो की एक अच्छा विचार हो सकता है अगर लोग भी धार्मिक हो जाए तो !

पिछले कई दशकों से हिन्दुओ ने नेहरू की निति का पालन करते हुए , अपने धार्मिक शाश्त्रो , वेदो गीता का मजाक ही बनाया है। पंडितो को फिल्मो एक कमीडियन के रूप मैं देख कर हम हिन्दुओ ने तालियां पीटी है। हम आज एक ऐसा समाज है जो की धर्म की रक्षा के नाम पर दंगे तो करता है लेकिन, भगवद गीता कभी नहीं पढ़ता है।

हिन्दुत्वादी VS सनातनधर्मी

हिंदुत्ववादी नेता केवल शोर मचाता है। उसको दूसरे धर्म के बढ़ते प्रभाव से डर लगता है इस डर का इस्तमाल वह सत्ता पाने मैं भी करता है। लेकिन ऐसे लोग कभी भी भगवद गीता- भगवान कृष्ण की शरण नहीं करते है । उलटे ये लोग इस्लामिक धर्म से प्रभावित हो कर अपने ही धर्म का अपमान कर बैठते है। लेकिन उनको लगता है की वो धर्म की रक्षा कर रहे है। जैसे हिन्दू धर्म में ही आपको ऐसे लोग मिल जायेगे जो की भगवान कृष्ण को भगवान नहीं मानते है , वो उनको मात्र एक मानव समझते है, यही बात तो इस्लाम और ईसाई धर्म के लोग भी कह रहे है , हिन्दू धर्म के ऐसे लोग ही आपको मूर्ति पूजा का विरोध करते मिल जायेगे। बिलकुल वैसे ही जैसे की इस्लाम को मानने वाले करते है।

हिन्दू धर्म खुद अपना दुश्मन

भगवदगीता मैं स्पष्ट रूप से चपटेर ३ के श्लोक सख्या 3 . 13 मैं आदेश दे रहे है की केवल

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || १३ ||

भगवान कृष्ण के भक्त सभी पापो से मुक्त हो जाते है क्योकि वो उनको अर्पित प्रसाद को ही खाते है। जो लोग सिर्फ अपनी इन्दिर्य सुख के लिए भोजन करते है वो पाप खाते है। कलियुग का यग है हरे कृष्ण महामंत्र का जप करना। तो अगर हर हिन्दू इस विधि का पालन करेगा तो अंततः मार्किट उसके हिसाब से वस्तुओ का निर्माण करेगा। अगर हिन्दू यह निश्चित कर ले की वो उसी वस्तु को स्वीकार करेगा जिसका भोग पहले भगवान विष्णु को लगा हो तो मार्किट उनके हिसाब से अपने फ़ूड पैक्ट्स पर “प्रसाद ” शब्द अंकित कर देंगे।

दिल्ली से पंजाब जाते हुए कभी हर ढाबे पर लिखा होता था वैष्णव ढाबा यानी की वो ढाबा ऐसा खाना बनाता होगा जो की भगवान विष्णु (कृष्ण) को अर्पित हुआ हो। लेकिन आधुनिक ज़माने मैं वैष्णो ढाबे भी सिर्फ नाम के वैष्णव है , वंहा पर प्याज , लहसुन और तामसिक प्रकृति का खाना बनता है। एक तरह से हम हिन्दुओ ने ही अपने धर्म का मजाक उड्या है. हिन्दुओ धर्म के लोगो को चाहिए की भगवद गीता का हर रोज अध्यन करे और उसकी सिक्षाओ के अनुसार अपना जीवन जीवे। केवल एक इसी तरह से हिन्दू धर्म की रक्षा हो सकती है। आप भी भगवान कृष्ण को भोग लगा कर भोजन खाये , अपने बच्चे को भी यही शिक्षा दे। लेकिन मेरा अटल विश्वाश है की कोई विरला हिन्दू ही ऐसा करेगा क्योकि हिन्दु ने अपने विनाश का मार्ग तो उसी दिन खोज लिया था जब उसने परम्परा से धर्म की शिक्षा न लेकर ऐसे व्यक्ति से शिक्षा ली जिसका विश्वाश भगवान शिव से सिर्फ इस लिए उठ गया हो क्योकि एक चूहे ने शिवलिंग से प्रसाद पा लिया।

एक भक्त का विचार हो सकता था की शिव जी महान वैष्णव है और वो अपने किसी भी गण को प्रसाद पाने के लिए इजाजत दे सकते है. लेकिन अश्रद्धालु के मन में विचार अलग ही आएगा। इसी पंथ ने आगे चल कर पुराणों और वेदो मैं भेद किया इससे प्रभावित हो कर यही प्रश्न आज इस्लामिक और ईसाई लोग उठाते है। इस पंथ के लोगो का ज्ञान नीचे से ऊपर जाता है , जबकि ज्ञान तो ऊपर से निचे आना चाहिए। जैसे ब्रह्मा जी के दवरा – नारद मुनि को नारद से व्यास जी को , व्यास जी चली परम्परा से बाद में भक्ति विनोद ठाकुर, बाबा गौर किशोर दास , भक्ति सिद्धांत सरस्वती , श्रील प्रभुपाद। इन सब आचर्यों ने सिद्ध किया है की कृष्ण भगवान है। इनके साथ साथ रामानुजआचर्य, निम्बार्कआचार्य और माधवाचर्य ने सिद्ध किया है की कृष्ण ही परम भगवान है।

हिन्दू धर्म की रक्षा कैसे होगी ?

आदि शंकराचर्या ने कहा है की

एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम्
एको देवो देवकीपुत्रएव |
एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकंतस्य देवस्य सेवा ||

आज के युग में लोग एक शास्त्र, एक ईश्वर, एक धर्म तथा एक वृतिके लिए अत्यन्त उत्सुक हैं | अतएव एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम् – केवल एक शास्त्र भगवद्गीता हो, जो सारे विश्व के लिये हो |एको देवो देवकीपुत्र एव – सारे विश्व के लिये एक ईश्वर हो – श्रीकृष्ण |एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि और एक मन्त्र, एक प्रार्थना हो – उनके नाम का कीर्तन, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे | हरे राम, हरे राम, राम, राम हरे हरे ||कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा – और केवल एक ही कार्य हो – भगवान् की सेवा | (गीता माहात्म्य ७)

तो सभी हिन्दू के इन अलग अलग समाज का त्याग कर के तरुंत आचार्यो की शरण में जाना चाहिए। उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन मैं ढालना चाहिए तभी हिन्दू से सनातन धर्म उज्जवल हो कर पूर्व दिशा मैं प्रकट हो कर समस्त विश्व का कल्याण करेगा

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