मासांहार करने वाले यवनो की उत्पति कैसे हुई?

महाभारत के आदि पर्व में नहुष पुत्र ययाति की कथा आती है।  इनका विवाह दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से हुआ था।  देवयानी की दासी शर्मिष्ठा ने भी मन ही मन ययाति को अपना पति स्वीकार कर लिया था।

शुक्राचार्य अपनी पुत्री देवयानी को यतति के साथ विवाह करने की अनुमति प्रदान करते हुए । (Yayati Gets Married with Devyani) Yayati with Shukarachrya & his daughter Devyaani

 विवाह के समय ही  शुक्राचार्य ने ययाति को एक पत्नी निष्ट रहने के लिए कहा था।  लेकिन एक दिन अपने महल के उधान में ययाति को शर्मिष्ठा से भेटवार्ता होती है।  जिसमे शर्मिष्ठा ययाति से संतान उत्पत्ति की कामना करती है क्योकि देवयानी की दासी होने के कारण उसने भी ययाति को अपना पति स्वीकार कर लिया था।  

इस प्रकार ययाति के  देवयानी से दो पुत्र हुए यदु और तुर्वसु।  और शर्मिष्ठा से  तीन पुत्र हुए –   द्रुहु -अनु और पुरु।  इस प्रकार बहुत समय बीत गया।  एक दिन जब देवयानी और ययाति अशोकवाटिका में घूम रहे थे। तो देवयानी को तीनो पुत्र दिखते है और उसको पता चल जाता है की ये पुत्र ययाति के  है।

देवयानी को अपने पति ययाति की दूसरी संतानों के बारे में पता चलता है । ( Devyani finds out Yayati’s sons from Shrmishta who was servant of Devyaani)

 इससे देवयानी नाराज हो कर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली जाती है।   जब शुक्राचार्य  को पता चलता है तो वो ययाति को बुढ़ापे का श्राप दे देते है।  और ययाति जवान से बूढ़े हो जाते है।

 

शुक्राचार्य ने ययाति को बूढ़े होने का श्राप दिया

अपनी ये स्थिति देख कर वो शुक्राचार्य से क्षमा मांगते है , तो शुक्राचार्य जी उनको बताते है की वो किसी व्यक्ति को अपना बुढ़ापा दे सकते है।  ऐसे में ययाति अपने सभी पुत्रो को अपने पास बुलाते है।  और उनसे कहते है की वो अपनी जवानी उनको दे दे।  सबसे पहले वो यदु को बुलाते है , यदु अपनी जवानी अपने पिता ययाति को देने से मना कर देता है।  और कहता है की बुढ़ापे में अनेक दोष है , इस  अवस्था में खान पान, ठीक नहीं रहता , शरीर मैं झुर्रियां पड़ जाती है

यह सुन कर ययाति यदु को श्राप देते है की तुम्हारी सन्तानो को राज्ये का हक़ नहीं रहेगा।  आगे चल कर उनके यदु से यदुवंशी की उत्पत्ति हुई

इस प्रकार उनके दसूरे पुत्र तुर्वसुको ने भी अपनी जवानी अपने पिता को देने से मना कर दिया।  ययाति ने तुर्वसुको को श्राप दिया की तेरा वंश नहीं चलेगा तू मांसभोजी, दुराचारी और वर्णसकर मलच्छो का राजन होगा इन्ही तुर्वसुको से बाद मैं यवनो की उत्पति हुई।  इस प्रकार द्रुहु ने भी पिता की आज्ञा का पालन नहीं किया।  और पिता की श्राप के कारण वह भोज बना।  लेकिन ययाति के सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी जवानी अपने पिता को दी।  और बाद मैं ययाति ने १००० वर्ष तक उसकी जवानी का इस्तमाल कर के पुरु को उसकी जवानी लौटा दी।  और उसको अपने राज्ये का उत्तराधिकारी बनाया।  इस तरह से महाभारत से हमे पता चलता है मांसखाने वाले यवनो की उत्पति कैसे हुई।  

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