पालघर लिंचिंग- एक भक्त की व्यथा

सभी बुद्धिमानी महापुरुषों व् शास्त्रों का मत है की गुरु की अवज्ञा कर के कोई मनुष्य शांति प्राप्त नहीं कर सकता, परन्तु हम कहाँ सुधरने वाले है! गुरु महाराज ने कहा है की यदि कोई सेवा नहीं है तो सोशल मीडिया से दूर रहो, परन्तु पूर्व की आदतें फिर से सिर उठाने लगीं । महानगरीय जीवन शैली में भक्तों का संग प्राप्त ना होने के कारण, मेरी बुरी आदतों का बांस का जंगल जो की ग्रीष्म ऋतू में जल गया था, कोरोना महामारी के कारण हुए लॉक डाउन में अत्यधिक अवकाश की वर्षा, प्राप्त कर फिर से हरा भरा हो गया था ।

हम मुस्तैदी से कभी महामारी की सुचना प्राप्त करने के बहाने से मोबाइल पर मुस्तैदी से जम गए और तभी से हमारी मन की शांति हवा होना शुरु हो गई ।

हमारा दुर्भाग्य तब शुरू हो गया जब एक दिल दहलाने वाली विडिओ पर हमारी दृष्टि चली गयी, विडिओ का मंजर भयानक था, इसमें एक भीड़ महाराष्ट्र के पालघर जिले में, भगवा वस्त्र पहने दो साधुओं को लाठिओं व् डंडो से निर्दयता पूर्वक मार, मार कर उनकी हत्या कर देती है । ऐसा नहीं था की उस भीड़ से उनकी रक्षा करने वाला वहां कोई नहीं था, पुलिस घटना स्थल पर मौजूद थी, साधू लाठिओं की मार से बचने के लिए बार बार पुलिस वाले के पास जाते थे पर पुलिस वाला उनका हाथ छिटक कर उन्हें भीड़ के सामने अकेला मरने के लिए छोड़ देता हैं ।

फिर सोशल मीडिया के सभी चेनलों पर एक शोर शुरू हो गया, कुछ चैनल घटना पर अपनी रिपोर्टों के द्वारा तो कुछ इस दुर्भाग्य पूर्ण घटना पर अपने मौन के द्वारा सोशल मीडिया पर शोर मचाने लगे ।

मैं यह सोचने पर विवश हो गया की घटना ने मुझे ज्यादा उद्वेलित किया या सोशल मीडिया पर घटना की विवेचना नें जो की इनके अपने पूर्वाग्रहों के कारण सत्य को प्रकाशित होने से रोक रही थी।

कुछ दिनों तक बार बार दृष्टि पटल पर नृशंस हत्या का दृश्य व चैनल पर वक्ताओं के वक्तव्य हृदय में कोलाहल करते रहें, परंतु वो एक आवाज जिसे सुनने के बाद सभी शोर बंद हो जाते हैं कहीं से सुनाई दी, ना बाहर से, ना भीतर से। अब कुछ कुछ समझ आ रहा था कि क्यों गुरु महाराज नवदीक्षित शिष्यों को सेवा के अतिरिक्त सोशल मीडिया से दूर रहने का आदेश दिया था।

गुरु महाराज कहते हैं की किसी भी समस्या के लिए व्यक्ति को गुरु, साधु और शास्त्र की शरण लेनी चाहिए, परंतु गुरु और साधु के पास जाने के लिए विनम्रता और उनके उपदेशों को जीवन में उतार कर उनकी सेवा करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए, जैसा की भगवान श्रीकृष्ण भगवत गीता के श्लोक संख्या ४.३४ में अर्जुन को कह रहे हैं :-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४॥

परंतु आधुनिक युग में मै विनम्रता का दिखावा तो कुशलता पूर्वक कर लेता हूं, पर वास्तविक विनम्रता मेरे से कोसों दूर है ।

और शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए जो संकल्प शक्ति, समय, और तपस्या चाइए वो असीमित भोग करने की प्रवृत्ति व आधुनिक जीवनशैली ने हमारे लिए दुर्लभ कर दीं हैं।

तो अपनी अयोग्यता के बावजूद, हमने अपनी भौतिक बुद्धि का ही आश्रय लिया और सोचा की घटना का विभिन्न दृष्टिकोणों से विश्लेषण करते हैं।

क्योंकि घटना मनुष्यों से संबंधित है अतः मानवता वादी दृष्टिकोण से विश्लेषण सही भी लगता है और ऐसा करना लोकप्रिय भी है। मानवता वादियों के अनुसार मानव जीवन सबसे बहुमूल्य है और उसकी निरंतर प्रगति और कल्याण ही किसी भी सभ्यता का लक्ष्य होना चाहिए। इस दृष्टिकोण से तीन मनुष्यों की निरपराध, नृशंस हत्या अत्यधिक निंदनीय है। मानवतावादियों के अनुसार मानव जीवन इतना महत्त्व पूर्ण है कि इसकी रक्षा किसी भी स्थिति में की जानी चाहिए, यहां तक यदि भारतीय संविधान के अनुसार यदि इन ३ मनुष्यों के हत्यारों को फांसी दी गई तो व कुछ मानवता वादी इसका भी विरोध और भृत्सना करेंगे, जैसा कि हमने निर्भया हत्या काण्ड के दोषियों के संबंध में देखा।

व्यवहार में हम यह भी देखते हैं कि बहुत से लोग जो स्वयं को मानवता वादी घोषित करतें है ऐसी ही किसी एक घटना पर तो जमीन आसमान सिर पर उठा लेतें है पर वैसी ही अन्य घटना पर उनकी वैसी प्रतिक्रिया नहीं होती। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इन मानवता वादियों के लिए मानव जीवन अपने आप में संपूर्ण व परम आदर्श नहीं है और उन्होंने भी अन्य वादों का चश्मा भी पहना हुआ है।

मानववाद में धार्मिक दृष्टिकोणों और अलौकिक विचार-पद्धतियों को हीन समझा जाता है और तर्कशक्ति, न्यायिक सिद्धांतों और आचारनीति (ऍथ़िक्स) पर ज़ोर होता है जबकि इसमें मनुष्य जीवन के लक्ष्य की कोई स्पष्ट व सर्व मान्य अवधारणा नहीं है। मानवता वादी यह भी भूल जाते हैं कि मनुष्य स्वभाव से ४ प्रकार के दोषों से ग्रसित रहता है – १) अपूर्ण इन्द्रियां,२) भ्रम में रहना ,३) गलती करना तथा ४) धोखा देने की प्रवृति, इसलिए मानवता वाद कोई परफेक्ट उपाय नहीं दे पाता, इसलिए हम पाते हैं मानवता वादी भी मानवों के प्रति द्वेष व पक्षपात पूर्ण व्यवहार करतें है। मानव कल्याण की अनेकों योजनाएं बनाने के उपरांत भी वे एक शांति पूर्ण समाज का निर्माण करने में असफल रहते हैं।

सामाजिक दृष्टि कोण से भी घटना एक गंभीर स्थिति की और इशारा करती है, की किस प्रकार लगभग एक संपूर्ण गांव निरपराध साधुओं की ना केवल निर्दयता पूर्वक मारता है तथा उन पर न्याय व्यवस्था के रखवालों की उपस्थिति का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

किस कारण से इतने सारे मनुष्य, एक साथ उन्मादी हिंसा के प्रभाव में आ जाते है कि उनके बीच एक भी मनुष्य शेष नहीं रहते।

हम अपनें बच्चों को कौन सी शिक्षा दे रहें हैं। क्या यह शिक्षा वास्तव में हमें मनुष्य बना पा रही है ? डिस्कवरी चैनल में जंगली कुत्तों द्वारा शिकार करने का दृश्य साधुओं के हत्या के दृश्य के सामने अधिक सभ्य लगता है। आज की शिक्षा व्यवस्था, जिसने सनातन धार्मिक शिक्षा को अछूत समझ कर तिरस्कृत कर दिया हैं, सभ्य मनुष्यों के समाज का निर्माण करने में असफल सिद्ध हो रही है।

आहार, निद्रा सुरक्षा तथा मैथुन की सुविधाएं तो पशुओं को भी सुलभ है, तो मनुष्यों में कुछ तो विशेषता होनी चाहिए जो उन्हें पशुओं से अलग करे।

आहार निद्रा भय मैथुनं च

सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।

धर्मो हि तेषामधिको विशेष:

धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

राजनैतिक और न्याय के दृष्टिकोण से घटना का विश्लेषण भी कोई आशा नहीं बंधाता। तीनों साधुओं ने कोई अपराध नहीं किया था अतएव भीड़ द्वारा उन पर की गई हिंसा विशेष रूप से निंदनीय है और यदि उन्होंने या किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया भी है तो दंड देने का अधिकार केवल राज्य के पास है।

अतः राज्य प्रमुख का आक्रोश अपराधियों पर गिरना चाहिए परंतु इस संदर्भ में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के द्वारा, अति शीघ्रता से, बिना किसी विस्तृत जांच पड़ताल के गाँव के लोगों को उनके चोर होने की ग़लतफ़हमी को, उनकी हत्या का कारण बताने से भविष्य के अपराधियों को शायद बल ही मिला होगा, उनके वक्तव्य में घटना को सांप्रदायिक ना होने की चिंता तो दिखाई दी, जो की उचित ही है,पर एक राज्य प्रमुख के नाते, ३ निरअपराध प्राणीओं की हत्या पर जिस रोष का अनुभव होना चाहिए, वह उनके वक्तव्य में मजबूती से दृष्टि गोचर नहीं हुआ ।

शायद उन्हें पीड़ितों को न्याय दिलाने से अधिक, विरोधियों को घटना से राजनैतिक लाभ ना हासिल करने देने की, चिंता थी । न्याय का यह मूलभूत सिद्धांत हैं कि राजा को ना केवल न्याय करना चाहिए अपितु न्याय करते हुए दिखना भी चाहिए तथा दंड अपराध की गंभीरता के अनुरूप बिना किसी पक्षपात या द्वेष के बिना दिया जाना चाहिए।

श्रील प्रभुपाद के अनुसार वैसे भी लोकतंत्र से कोई अधिक आशा नहीं रखते थे। उनके अनुसार यह मुढ़ व्यक्तियों की सरकार मूढ व्यक्तियों के लिए है, जहां निर्णय धर्म पर आधारित ना हो कर, सत्ता के लिए वोटों के जुगाड के आधार पर होतें है।

पुलिस की जिस वव्यस्था से नागरिक, सुरक्षा की आशा रखतें हैं वह केवल अपनी सुरक्षा करते हुए और निर्दोषों की बलि लेती हुई दिखाई पड़ी । साधू ना केवल भीड़ की हिंसा के शिकार हुए बल्कि पुलिस ने उनकी रक्षा करने के अपने कर्तव्य का निर्वहन ना करके, उन पर भीड़ से भी अधिक हिंसा की, अतः पुलिस का बचाव नहीं बल्कि दोषियों से भी अधिक दंड दिया जाना चाहिए। यहां इस प्रश्न पर भी क्या विचार नहीं होना चाहिए कि पुलिस के इस आचरण के पीछे क्या कारण हैं? कहीं ऐसा तो नही की जिस दैवीय वर्ण व्यवस्था की स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने संस्तुति की हैं उसे हमने स्वयं को भगवान से भी अधिक समझदार समझते हुए त्याग दिया है।

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥BG ४.१३॥

भगवान ने ये चार सामाजिक वर्ग जन्म के आधार पर नहीं वरन व्यक्तिओं के गुणों व कर्मो के अनुसार बनाए थे, परंतु आज हम लोगों को उनके स्वाभाविक गुणों को पहचान वह शिक्षा नहीं दे पा रहे जिससे वे एक आदर्श शिक्षक, प्रशासक, व्यवसाई व सेवक बन सकें।

आध्यात्मिक स्तर पर यदि हम देखें तो आत्मा अविनाशी है, जैसे कि भगवान श्रीकृष्ण भगवत गीता में शिक्षा देतें है :-

न जायते म्रियते वा कदाचि-

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२.२०॥

आत्मा के लिए किसी भी काल में ना तो जन्म है ना मृत्यु। वह ना तो कभी जन्मा है, ना जन्म लेता है और ना जन्म लेगा। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत तथा पुरातन हैं। शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता।

इस पर भी वीभत्स घटना दुखदाई है! ना केवल मनुष्यों की बल्कि सभी जीवों की हत्या को पाप पूर्ण कृत्य बताया गया है, क्योंकि इस के द्वारा जीवात्मा की विभिन्न शरीरों के माध्यम से चेतना के विकास की क्रमिक विकास की प्रक्रिया बाधित हो जाती है और जीवात्मा का लक्ष्य जो कि परमात्मा की प्रेममयी सेवा करना हैं, उसमे विलंब हो जाता है।

भगवत गीता में कम से कम ३ स्थानों ( B.G. १०.५, १३.८ व १६.२) पर भगवान ने अहिंसा को दिव्य गुण बताते हुए उसकी संस्तुति की है।

श्लोक संख्या १३.८ के तात्तपर्य में अहिंसा को परिभाषित करते हुए श्रील प्रभुपाद कहते है, “अहिंसा का सामान्य अर्थ वध ना करना य शरीर को नष्ट ना करना लिया जाता है, लेकिन अहिंसा का वास्तविक अर्थ है, अन्यों को विपत्ति में ना डालना, देहात्मा बुद्धि के कारण सामान्य लोग अज्ञान द्वारा ग्रस्त रहते है और निरंतर भौतिक कष्ट भोगते रहते हैं। अतएव जब तक कोई लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ऊपर नहीं उठाता, तब तक वह हिंसा करता रहता है। व्यक्ति को लोगों में वास्तविक ज्ञान वितरित करने का भरसक प्रयास करना चाहिए जिससे वह प्रबुद्ध हो और इस भव बंधन से छूट सकें। यही अहिंसा है।”

क्योंकि प्रत्येक दृष्टिकोण से उक्त यह हिंसात्मक घटना दुःखदाई व निंदनीय है, तो क्या करें?

अधिसंख्यक लोग, क्योंकि वे अभी तक इस हिंसा से अछूते है, पूर्ववत अपने कार्य कलापों में व्यस्त रहेंगे। वे यह नहीं जानते कि हिंसा की आग के लिए ईंधन इस कलह के युग में सर्वत्र उपलब्ध है और देर सबेर यह आंच उन तक भी पहुंच जाएगी।

कुछ लोग जो थोड़े अधिक समझदार हैं, कुछ दिन तक घटना की पोस्ट को सोशल मीडिया पर शेयर कर अपने आक्रोश का प्रदर्शन करेंगे, कुछ कैंडल मार्च का भी आयोजन हो सकता है पर शनेः शनेः शांति पूर्ण विरोध की अग्नि भी शांत हो जाएगी।

कुछ लोग न्याय व्यवस्था की गैर विश्वसनीयता को इंगित कर आवेश में दंड विधान अपने हाथ में लेने की बात करेंगे खुद भी उसी हिंसक भीड़ में शामिल हों जाएंगे जिसका वे प्रतिकार करना चाह रहे थे।

तो हम क्या करें? इस प्रश्न के जवाब से पहले भी हमें एक प्रश्न स्वयं से करना पड़ेगा। और वह प्रश्न है हम कौन हैं?

अगर हम केवल शरीर ही हैं तो यह तो प्रत्येक क्षण बदल रहा है, पर हम तो अपने अस्तित्व में निरन्तरता का अनुभव नहीं करते।

हम हमारे अस्तित्व का स्त्रोत कहां है? क्या हमारे माता पिता? तो उनका स्त्रोत कौन है? प्रश्नों की यह श्रंखला कहां जा कर समाप्त होती है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते है, “हे कुन्ती पुत्र सभी योनियों का अस्तित्व इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा संभव होता है और मैं उनका बीज प्रद पिता हूं।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥४॥

अब भगवान श्रीकृष्ण हमें यह भी सूचना दे रहें है कि हमें क्या करना चाहिए जिससे हम शांति प्राप्त कर सकें।

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥२९॥

वे कहते हैं, “मुझे समस्त यज्ञों (कर्म) तथा तपस्याओं का परम भोक्ता, समस्त लोकों का परमेश्वर एवं समस्त जीवों का उपकारी एवं हितैषी जानकर मनुष्य शान्ति प्राप्त करता हैं।

वे कोई स्वार्थी जीव नहीं हैं जो समस्त भोग अपने लिए चाहता है, यह उनकी स्वाभाविक स्थिति है। अन्य जीवात्माएं जो उनकी शाश्वत अंश है, उनकी सेवा के माध्यम से ही शान्ति व आनंद प्राप्त कर सकते हैं। अन्य कोई मार्ग ही नहीं हैं। मछली जल में ही सुखपूर्वक रह सकती हैं। हम संपूर्ण संसार में चाहे कितनी ही सुविधाओं के साथ रहें हमें संपूर्ण शान्ति अपने घर में ही प्राप्त होता है। हम अपनी स्वाभाविक स्थिति ” जीवेरे स्वरूपे कृष्णेरे नित्य दास” में कृष्ण की सेवा द्वारा ही संतुष्ट हो सकते है।

आप कह सकते हैं पर आपने यह तो बताया ही नहीं की साधुओं की हत्या की घटना के बारे में क्या ? क्या भगवान के भक्त, लोगों के दुखों के प्रति उदासीन हो स्वांत सुखाय हेतु भगवान की भक्ति में लगें रहतें है ?

ऐसा संभव ही नहीं हैं भगवान के भक्त पर दुःख दुःखी होते हैं तथा उन्हें वास्तविक परोपकार की विधि भी ज्ञात होती है, इसलिए वे निकल पड़ते हैं श्रील प्रभुपाद का अनुसरण करते हुए, जिन्होंने अपने गुरु की प्रसन्नता के लिए अपने कष्टों की तनिक भी परवाह नहीं की और हिंसा, अवसाद, ड्रग्स, से ग्रसित लाखों हिप्पियों को हैप्पी बना दिया।

हमनें यूनाइटेड नेशंस को देखा है और ना जाने कितनी ही पीस फाउंडेशन को देखा है, पर विश्व पहले से अधिक अशांत हैं।

कृष्ण भावनामृत ही एक मात्र विधि जिससे एक शांति पूर्ण समाज का निर्माण किया जा सकता है। आज से ५५० वर्ष पूर्व स्वयं कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के अवतार के रूप में कृष्ण भक्ति की शिक्षा देने तथा हरिनाम संकीर्तन के युग धर्म का प्रारंभ करने हेतु आए और उन्होंने अपने आचरण से यह शिक्षा दी।

आपनी करिमु भक्त- भाव अंगीकारे।

आपनी आचरे भक्ति सिखाईमु सबारे।।

हमारा कर्तव्य है कि भगवान व उनके भक्तों की इस काम में सहायता करें।

आइए प्रभुपाद की पुस्तकों का एक भारी झोला कंधो पर उठा लें, मृदंग और करताल पर हरे कृष्ण महामंत्र, और कृष्ण प्रसाद लेकर इन दिव्य वस्तुओं को पीड़ित मानव समाज में बांटने के लिए निकल पड़े।

हिंसा से बचने का एक मात्र तरीका सभी का प्रिय हो जाना हैं और कृष्ण क्योंकि परम सत्य हैं, उनके प्रिय बन कर ही हम सभी के प्रिय बन सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद भगवत के १८ अध्याय के ६८ व ६९ वें श्लोक में उनका प्रिय बनने का तरीका बता रहे हैं –

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।

भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥६८॥

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥६९॥

जो मनुष्य यह ज्ञान (श्रीमद भगवत गीता) अन्य भक्तों को बताता है उससे अधिक प्रिय मुझे कोई नहीं है।

तो आइए हम सब श्रीकृष्ण तथा श्रील प्रभुपद का प्रिय पात्र बनें !

रुपानंद दास

(परम पूजनीय भक्तिविकास स्वामी महाराज का शिष्य)

Share