परम् भगवान कौन?

हिन्दू धर्म पर अधिकतर ईसाई – मुसलमान लगातार इस बात को लेकर हमला करते है की हिन्दू धर्म एक बहुल देव /भगवान मानने वालो का धर्म है। कई बार वो हिन्दू धर्म की तुलना पैगनस के साथ भी करते है। इसाई और मुस्लिम् पैगनस उन ट्राइबल लोगो को बुलाते थे जो की अज्ञानतावश किसी को भी भगवान् स्वीकार कर लेते थे ।  जब वो हमारे देश में आये तो उन्होंने सनातन धर्म को भी पैगनस मान्यता का विस्तार माना। इन धर्मो में पैग्न्स को असभ्य मना जाता है।  और इसको साबित करने के लिए उन्होंने हमारे वेदों और शाश्त्रो की गलत व्याखा भी की ।

आज सोशल मीडिया मे , उनके धार्मिक गुरुओ के द्वारा जैसे  डॉ. जाकिर नायक , एवं ईसाई मिशन के द्वारा यह सब तर्क दे कर भारी सख्या मैं धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। हम देखते है की किस तरह से जाकिर नाइक ने गणेश जी का और शिव जी का अपमान किया है। लेकिन इस अपमान में हमारे हिन्दू धर्म के लोग भी शामिल है।  जो की अपने शाश्त्रो का गहन अध्यन नहीं करते है और सीधा जा कर जाकिर नाइक के डिबेट में शामिल हो जाते थे। आज जाकिर नाइक हिन्दुस्तान में नहीं है लेकिन उसकी विचार धरा आज भी मुस्लिम्स के बीच में फैली है वो सब आज भी हिन्दुओ को बहुल देव वादी कह कर हमारी एक ईश्वरवाद कांसेप्ट को इगनोरे कर के सिर्फ गलत प्रचार करते है, इसके कारण बहुत तेज़ी से धर्म परिवर्तन हो रहा है ।

अधिकतर हिन्दू जो की  हिन्दू  बहुल इलाको मैं रहते है वो श्याद कभी भी इस तरह के प्रश्नो का समाना नहीं करते होंगे।  लेकिन जिन हिन्दुओ के बच्चे कान्वेंट स्कूलों मे जाते है वंहा पर धीरे धरे हिन्दुओ का ब्रेन वाश किया जाता है और हिन्दू धर्म को एक कन्फ्यूज्ड रिलिजन की तरह प्रस्तुत किया जाता है।  क्योकि इसाई एवं मुस्लिम हमेशा चर्चा यंही से शुरू करते है की परमपिता परमेश्वर अनेक नहीं हो सकते। और यह बात सही भी है।

अधिकतर हिन्दू इस प्रश्न से चिढ़ जाते है- की हमने तो बचपन में अपने माँ बाप से यंही सिखा है।  हमारे माँ बाप उनके माँ बाप सभी को मानते आये है सब भगवान् है लेकिन अगर गहराई से सोचे तो जब किसी देश का प्रधानमंत्री एक होता है तो भला ३२ या ३३ करोड़ भगवान् कैसे हो सकते है? इसलिए आमिर खान pk जैसी फिल्म बानाता हमारा मजाक उडाता है और हम भी उसके साथ माजाक बनाते है और फिर से अपने कामो में व्यस्त हो जाते है।  तो एक हिन्दू किसी को भी भगवान मान सकता है एक पीपल के पेड़ से लेकर , इंद्र को , और इंद्र से लेकर ब्रह्मा को , ब्रह्मा से लेकर शिव को और जब ये सब कम पड़ गए तो फिर उन्होंने साईं बाबा को भी भगवान स्वीकार कर लिया।  और तो और जब एक संतोषी माता नाम की फिल्म आयी तो संतोषी माता को देवी स्वीकार कर लिया लेकिन संतोषी माता का नाम भारत के किसी भी वेद , या धार्मिक वाक्यों मैं नहीं आता है।  जंहा से भी दूकान चल निकले बस वो ही हिन्दुओ के भगवान् बन जाते है।

लेकिन परम् सत्य तो एक ही है। लेकिन हम आगे बड़े सबसे पहले आपको यह समझना होगा की आप हिन्दू है ही नहीं। किसी भी ४ वेद, १८ पुराण और उपनिषद में हमें हिन्दू कह कर नहीं बुलया गया है । अगर कोई शब्द आया है तो वह है “सनातन धर्म”  जिसका न कोई आदि है न ही कोई अंत। क्योकि हम सब एक आत्मा है और आत्मा सनातन है इसका कभी अंत नहीं हो सकता तथा कोई भी इसकी शुरुवात का पता नहीं लगा सकता है।

जब ऐसे हिन्दुओ को हम बताते है की भगवान सिर्फ एक है और उनका नाम है ‘कृष्ण’ तो वो लोग उतना ही गुस्सा होते है जितना की एक मुसलमान , आर्य समाजी या ईसाई होता है ये जान कर की हिन्दू धर्म एक Monotheistic एकल वाद धर्म है जंहा पर भगवद गीता एक निर्णय शाश्त्र है और कृष्ण एक मात्र भगवान् है जो की निरकार भी है- परमात्मा स्वरूप मैं आपके हृदये मैं भी है और अपने लोक में सदा साकार रूप में अपने भक्तो के संग निवास करते है।    

तो आप धैर्य के साथ इस लेख को पड़े जिसमे हम आज जानेगे की आखिर परम् भगवान कौन है? भगवान शब्द का अर्थ विष्णु पुराण के अनुसार यह है। 

।। aishvaryasya samagrasya viryasya yashasah shriyoh, jnana।।
।। vairagyayoshchaiva shannam bhagam itim gana” ।।

।। ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियोह।।
।। ज्ञाना वैराग्ययोश्चैव शनणम भागम इतिमगणा।।

उपरोक्त श्लोक के अनुसार भगवान शब्द का अर्थ है जिसके एक साथ एक समय में ये सभी गुण हो। जिसके पास सम्पूर्ण ऐश्वर्य हो,  सम्पूर्ण बल हो , सम्पूर्ण धन हो , सम्पूर्ण वैराग्य, सम्पूर्ण सौंदर्य, सम्पूर्ण वैराग्य हो, जिसमे ये समस्त गुण हो वो ही भगवान है।

भगवान कृष्ण के अन्य कोई भी नहीं है जिसमे एक साथ ये सभी गुण आते हो। वह जब इस धरती पर प्रकट हुए तब उन्होंने इन्ही गुणों का सभी मानव जाती के कल्याण हेतु प्रदर्शन भी किया लेकिन तब भी कंस , दुर्योधन तथा ऐसे कई अन्य असुर थे जो की कृष्ण को भगवान स्वीकार नहीं करना चाहते थे।

और हमारे पुराणों से प्रमाण मिलते है की भगवान कृष्ण में ये सभी छ: गुण समाहित है।  इसका एक प्रमाण भृगु ऋषि की कथा से आता है

कहते है एक बार कई हजारो वर्षो तो आपस में चर्चा करने करने के बाद भी साधू इस नतीजे पर नहीं पहुच पाए की परम् भगवान कौन है। तो वो सब ने मिल कर भृगु ऋषि से पार्थना की इसका निर्णय अब वो ही करे की  त्रिमूर्ति यानी शिव –ब्रह्मा –विष्णु में  परम् भगवान कौन है ?

भृगु ऋषि ने इस सेवा के लिए अपनी स्वकृति दे दी। और इस परीक्षा के लिए वो सब से पहले ब्रह्मा जी  के पास पहुचे जो की भृगु ऋषि के पिता भी  और इस भोतिक जगत के रचनाकार भी है । ब्रह्मा जी के पास पहुच कर  भृगु ऋषि को ब्रह्मा जी को प्रणाम करना चाहिए था, लेकिन भृगु ने ऐसा जान – बुझ कर नही किया। फिर क्या था ब्रह्मा जी को भृगु ऋषि के इस असभ्यता पर बड़ा ही क्रोध आया।  लेकिन भृगु ऋषि तो ब्रह्मा जी की परीक्षा ले रहे थे ।  और यह जान कर की उनके मन से हुए इस अपराध को ब्रह्मा जी को विचलित कर दिया तो इससे यह निष्कर्ष निकला की यह कोर्ध भोतिक जगत के परभाव से उत्पन हुआ है लेकिन वास्तव में परम् भगवान तो भोतिक जगत से अप्रभावित होते है ।  जैसे की भगवान कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है

मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ Bg. 9.10

अर्थार्त की हे कुंती पुत्र (अर्जुन) यह भोतिक जगत उनसे प्रकट एक शक्ति है सभी चर और अचर वस्तुओ उनसे परकत है और उनके निर्देशन में कार्य करती है . भगवान् इस प्रकति को नियत्रिंत करते है लेकिन वो कभी भी इससे से प्रभावित नहीं होते है  ।   

इसके बाद भृगु ऋषि कैलाश पर्वत पर शिव जी से मिलने के लिए पहुचे, उनके भी परीक्षा करने के लिए भृगु मुनि तैयार थे। भृगु ऋषि शिव जी के भाई है, क्योकि दोनों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी से हुई है। उनको देख कर शिव भृगु ऋषि से गले मिलने के दौड़े लेकिन भृगु ऋषि ने उल्टा शिव जी को डांट कर दूर कर दिया। और जान-भूझ कर शिव जी को उलटी सीधी बाते कही भृगु मुनि ने कहा की तुम कई दिनों तक स्नान नहीं करते हो, विष भरे सांपो के साथ रहते हो, श्मशान की भस्म अपने शरीर पर लगाते हो तुम मुझ से दूर ही रहो , शिव जी को यह अपना अपमान लगा और क्रोध पूर्वक हो कर वह अपने त्रिशूल से भृगु मुनि को सबक सिखाने के लिए दौड़े ।  लेकिन इससे पूर्व ही भृगु मुनि वंहा से अंतर्ध्यान हो कर विष्णु जी के लोक में गए ।  वंहा पर शेषनाग पर विश्राम करते हुए भगवान विष्णु को उन्होंने उनकी छाती पर लात मारी, जिससे भगवान विष्णु की कोमल छाती पर भृगु मुनि के चरण के निशान पड़ गए ।  इस पर भी भगवान विष्णु क्रोधित नहीं हुए , बल्कि उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की , वो भृगु मुनि का सवागत सही से नहीं कर पाए ।   और साथ में उन्होंने भिर्गु मुनि से पुछा की कंही उनके पैरो को उनकी वर्ज जैसी छाती पर लात मार कर चोट तो नहीं लगी ।  उनका यह सवभाव देख कर भृगु मुनि संतुष्ट हो गए की भगवान विष्णु ही परम भगवान भगवान है ।  क्योकि वो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से परभावित नहीं होते है प्रक्रति में होने वाली घटनाएं उनको परभावित नहीं करती है।

श्रीमद भागवतम से प्रमाण  

आज लोग यह पूछते है की इतने सारे ग्रन्थ है ।  जिसमे सभी देवी देवताओ की पूजा का उल्ल्खे किया गया है तो इतना कनफूजन क्यों है ? इसका जवाब हमें श्रीमद भागवतम के पर्थम खंड और पांचवे अध्याय में मिल जाता है जो इस प्रकार है :

जब व्यास मुनि जी ने चारो वेदों और 18 पुरानो, सभी उपनिषदों और इतिहास का सकंलन कर दिया तो भी उनके हृदये को संतुष्टि नहीं मिली ।   जब वो इस तरह से उदास थे और इस पर विचार कर रहे थे उनके जन कल्याण के लिए किये गए कार्य के बाद भी उनका हृदये आखिर असंतुष्ट क्यों है तो वह थोड़ी देर के लिए ध्यान में बैठ गए ऐसे में उनके समक्ष नारद मुनि प्रकट हुए नारद मुनि ने व्यास से जी उनकी उदासी का कारण पुछा।    तो व्यास मुनि ने स्वीकार किया

व्यास उवाच
। । अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं । ।
। । तथापि नात्मा परितुष्यते मे । ।
। । तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधं । ।
। । पृच्छामहे त्वात्मभवात्मभूतम् । ।

1. 5. 5 SB


उपरोक्त श्लोक में व्यास मुनि स्वीकार कर रहे है की ग्रंथो की रचना के बाद भी वह आत्म-तुष्ट (संतुष्ट ) नहीं हुए है । और उन्होंने नारद मुनि से अपनी इस असंतुष्टि की वजह जाननी चाही ।

श्रीमद भागवतम के श्लोक सख्या 1. 5. 9 में नारद मुनि श्री श्री व्यास देव जी को कहते है

यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिता: ।
न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णित: ॥
श्रीमद भागवतम 1.5. 9

श्री नारद मुनि जी ने कहा की तुमने धर्म अर्थ काम मोक्ष के लिए विधि का वर्णन तो विभिन पुराणों में किया लेकिन तुमने भगवान वासुदेव की महिमा का वर्णन नहीं किया ।  ऐसा करने से तुमने जन साधारण को जीवन के उचतम लक्ष्य से भटका दिया ।  जीवन का उचतम लक्ष्य है भगवान वासुदेव , गोविन्द या कृष्ण के सेवा में अनुगत होना ।   

यंहा पर नारद मुनि ने श्री व्यास ऋषि को विभिन्न ग्रंथो में भिन्न भिन्न देवी देवताओ की पूजा से लोगो को भर्मित करने के लिए उनकी आलोचना की क्योकि उन्होंने परम भगवान वासुदेव की महिमा का वर्णन नही किया ।

श्री नारद मुनि ने श्लोक सख्या 1.5.10 से 1. 5. 12 में व्यास मुनि को बताया की तुम्हारे द्वरा संकलित शाश्त्रो में भगवान वासुदेव के नाम गुणों की चर्चा न होने से वो सिर्फ कोवो के द्वरा मचाये हुए शोर के सामान हो गए है इसके आलावा जिन शास्त्रों में  भगवान की नाम, प्रसिद्धि, रूप, अतीत, की पारलौकिक झलकियाँ सुनने और दर्शन करने को मिलती है बेशक से ऐसे शाश्त्र भाषा ज्ञान में कमतर हो लेकिन उनको हमेशा ही भगवदजन, भक्तो और साधुओ का सम्मान मिलता है।  इस तरह से नारद मुनि ने फिर श्री व्यास देव जी को श्रीमद भागवतम लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जिसे की परम भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत लीलाओं का वर्णन जन जन तक पहुचे और उन्हें भोतिक बंधन से से मुक्ति मिल सके श्रीमदभ्ग्वातम 1.5.13

 श्लोक संख्या 1.5.14 में नारद मुनि ने व्यास देव जी को कहा की जिस परकार तुमने विभिन पूजा प्रणाली और     भिन्न नामो रूपों का वर्णन किया है उससे जन मानस से के मन शांत होने के बजाये आश्रय विहीन हो जायेगे ठीक उसी प्रकार जैसे की एक नाव को चक्रवात लक्ष्यहीन कर देता है ।  

यंहा पर व्यासदेव जी को नारद मुनि का स्पष्ट उपदेश है की उनके अलग अगल पुराणों के संपादन करते हुए अनेक देवी देवताओ के रूपों और पूजा किये जाने की जो संस्तुति की है उससे यह परिणाम हुआ है की जन सामान्य भ्रांत है की वे किस परम भगवान की सेवा में अपना मन को स्थिर करे ।  

नारद मुनि जी के इन वचनों को सुनने के बाद श्रील व्यास देव जी ने भगवान श्री कृष्ण के अद्भुत, और माधुर्य रस से भरपूर श्रीमद भागवतम का संपादन किया जिसमे उन्होंने जन साधारण को स्पष्ट किया की ‘कृष्ण तू भगवान स्वयं’  (1 3 28 श्रीमद भागवतम) की कृष्ण ही स्वयं पूरी श्रृष्टि के भगवान है

ब्रह्मसंहिता  से प्रमाण

 ब्रह्मसंहिता में ब्रह्मा जी ने 5.1 में घोषणा की है ‘कृष्ण ही परम इश्वर है और उनका स्वरूप सत- चित- आनद से युक्त है, वो  गोविन्द अनादी: आदि है यानी की जिसका कोई प्रारभ और अंत नहीं है  और वो ही सभी कारणों के कारण है ।  

‘ईश्वरः परम: कृष्ण:

सत चित आनंद विग्रह:

आनादी: आदि: गोविन्द:

सर्व कारण कारणं

īśvaraḥ paramaḥ kṛṣṇaḥ
sac-cid-ānanda-vigrahaḥ
anādir ādir govindaḥ
sarva-kāraṇa-kāraṇam
5.1

यंहा पर ब्रह्मा जी ने आदि पुरुष को कृष्ण कह कर पुकारा है क्योकि कृष्ण ही सब की स्त्रोत है ।

एक अन्य प्रश्न भी प्रया: पुछा जाता है क्या भगवान विष्णु और कृष्ण विभिन्न है ? विष्णु से कृष्ण प्रकट होते है या फिर कृष्ण से विष्णु क्या इनमे कोई भेद है या फिर ये एक है ।  जिस प्रकार एक दीये से दूसरा दीया जलया जाता है तो क्या दोनों की ज्योति में कोई भेद होता है? नहीं होता है ? और जिस प्रकार एक व्यक्ति अपनी जिन्दगी में कई रोले होते है वो एक पति होता , पर किसी के लिए भाई , किसी दुसरे के लिए मामा, चाचा होता है लेकिन वास्तव में  में होता तो वो एक ही ।  इसी प्रकार कृष्ण वृन्दावन में बासुरी बजाते हुए गोप के साथ खेलते हुए और गौ चारते है उनका ये जो रूप है इस रूप में वो गौलोक धाम में बसते है और भक्तो को निरंतर सुख प्रदान करते है ।  भगवान कृष्ण से सबसे बलदेव जी प्रकट होते है , बलदेव जी से संकर्षण और संकर्षण से नारायाण , और नारायण से महा-संकर्षण से विष्णु तत्व के ही पुरष अवतार कारणोंदोक्षायी विष्णु से गर्भोदाक्षायी विष्णु तथा   क्षिरोदाक्ष्याई विष्णु प्रकट होते है । और कृष्ण ही स्वयं भगवान है इसकी पुष्टि श्रीमद भागवतम के इस श्लोक में हो जाती है  

एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।

इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ 

SB 1. 3. 28

इस श्लोक से स्पष्ट हो जाता है की बाकी के सब अवतार पूर्ण अंश या पूरण अंश  के अंश है, लेकिन कृष्ण तो आदि पूर्ण पुरषोत्तम परम भगवान् है ।  और वो विभिन्न लोको में नास्तिको के कारण होने वाले उपद्रोवो का विनाश करने के लिए उत्पन्न होते है ।  

अथर्व वेद के गोपथा ब्राह्मण, पूर्व 2. 10 

एवं इमे सर्व वेद निर्मितः सकल्पाः सरहस्यः सब्रह्मणाः

सोपनिषत्काः सेतिहासः संवख्यतः सपुराणां 

अर्थार्त इस तरह, सभी वेद कल्प, रहस्या, ब्राह्मण, उपनिषद, इतिहस, अन्वयता और पुराण के साथ प्रकट हुए थे

भगवान श्री कृष्ण का वेदो मैं उल्लेख

यजुर्वेद के शुक्ल भाग के मधयनदिना-श्रुति बृहदारण्यका उपनिषद 2. 4. 10 के अनुसार

अस्य महतो भूतस्य निःश्वासितम एतद यद् रग्वेदो  समां

वेदोयजुर्वेद थर्वांगिरसा इतिहासः पुराणम इत्यादिना 

यजुर्वेद, ऋग्वेद  सामवेद , अर्थवेद इतिहास पुराण  सभी भगवान की श्वाश से उतपन्न हुए है।  यानी वेद खुद बता रहे की उनकी उत्पति कैसे हुई और इसमें इतिहास , पुराण को पंचम वेद स्वीकार किया है।  इस तरह से यह स्पष्ट हो जाता है की श्रीमद भगवतम, महाभाहरात और रामायण भगवद गीता सभी भगवान के द्वारा प्रकट है और उनके पूर्णतः स्वीकार करना चाहिए पुराण और इतिहास पंचम वेद है  कौथुमीय छान्दोग्य उपनिषद  7 ।  1 ।  14  (Kauthumiya Chandogya Upanisad 7। 1। 4)

और इसकी को श्रीमद भागवतम स्मृति मे भी कन्फर्म किया गया है 3.12.39  की इतिहास पुराण पंचम वेद है, फिर भी कुछ निरकारवादी / इस्लामिक जानकार इसी बात को बार प्रस्तुत करते है की चार वेदो मैं कंही पर भगवान कृष्ण या राम का उल्लेख  क्यों नहीं हुआ है।  इस तरह से बिना किसी प्रमाणिक गुरु के निर्देशन में वो सब   सनातन धर्म के बारे में मनगड़ंत बाते बोलते है उनका विचार है की वेदो के भगवान निराकार है।  जबकि ऊपर हमने यह सपष्ट किया की किस तरह से श्रुति यानी वेद खुद बोल रहे है की इतिहास पुराण पंचम वेद है। इस लिए ऐसा नहीं हो सकता की आप सिर्फ वेदों एक हिस्से को स्वीकार करे और बाकी को रजेक्ट कर दे ।  

निचे कुछ वेद वाकय प्रस्तुत है जिनसे पता चलता है वेद मैं भी भगवान कृष्ण को मेंशन किया गया है  जैसे की

 Rig Veda 1। 164। 31

अपास्याम गोपाम अनिपद्यमाना माम् च परा च पथिभिः

चरन्तं सा सध्रीचिः सा विसूचिर वसना अवतिरवती भुवनेश्व अन्तः

apasyam gopam anipadyamana ma ca para ca pathibhis carantam

sa sadhricih sa visucir vasana avatirvati bhuvanesv antah

Rig Veda 1। 164। 31

अर्थ “मैंने एक गोपाला (गोप) देखा। वह कभी  भी अपने पद से गिरता नहीं है; कभी-कभी वह निकट होता है, और कभी-कभी दूर-दूर तक विभिन्न रास्तों पर गौ चारण के लिए घूमता है।   वह  सभी जीव आत्माओ का मित्र है, जिसे प्रेम पूर्वक कई तरह के वस्त्रो से सजाया गया है। वह भौतिक दुनिया में बार-बार आता है। 

उपरोत्ख श्लोक से स्पष्ठ होता है कृष्ण को गोप (गोपालक ) के रूप में वर्णन किया गया है और उनको परम भगवान स्वीकार किया गया है। 

इसके अलावा ऋग्वेद के 1। 116। 23 , 8। 74। 3,4  मे इन्ही गोविन्द को कृष्ण नाम से सम्भोदित किया गया है। 

इसी तरह से छन्दोगया उपनिषद  3. 17 मे  वर्णन आया है। 

तद्धैतद्घोर् आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः

taddhaitadghor āṅgirasaḥ kṛṣṇāya devakīputrāyoktvovācāpipāsa eva sa babhūva so’ntavelāyāmetattrayaṃ pratipadyetākṣitamasyacyutamasi prāṇasaṃśitamasīti tatraite dve ṛcau bhavataḥ || 3। 17। 6 ||

घोरा अंगीहा ऋषि ने अपने शिष्य को सलाह दी कि वह देवकी देवी के पुत्र भगवान श्रीकृष्ण को पुकारे क्योकि कि मृत्यु उनके कंधे पर बैठी है क्योकि वे अविनाशी कला है; अजेय है  और इस पुरे अनत ब्रह्माण्ड की बुनियाद है। 

अर्थवेद के गोपाल तापनि उपनिषद में आया है की  ॐ नमः सतचित आनंद रूपया कृष्णायकलिष्ट: कारिणे नमो वेदांत वेद्याय गुरवे बुद्ध साक्षिणे 

om namah sac-cid-ananda-rupaya krishnayaklista-karine namo vedanta-vedyaya gurave buddhi-saksine

अथार्त मैं श्री कृष्ण को अपना सम्मानजनक श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूं, जिसका स्वरूप अनन्त है और ज्ञान और आनंद से भरा है, जो संकट से बचाने वाला है, जो वेदांत से समझा जाता है, जो सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु है, और जो हर किसी के दिल में परमाता के रूप द्रष्टा है।

तवं वस्तुंय उसमसी गामध्ये

यात्रा गावो भूरी-श्रंगा अयसः

अत्रहा तद उरुगायस्य कृष्णाः

परमम् पदम् आवभअति  भूरी

ta vam vastuny usmasi gamadhyai

yatra gavo bhuri-srnga ayasah

atraha tad urugayasya krsnah

paramam padam avabhati bhuri

हम आपके [राधा और कृष्ण के] सुंदर घरों में जाना चाहते हैं, जंहा पर उत्कृष्ट सींग वाले गायें विचर रही  हैं। फिर भी इस धरती पर विशिष्ट रूप से चमकने वाली आपकी परमपिता परमात्मा का वास है जो हे उरुगय ऐसा स्थान है जंहा पर हमेशा कृष्ण का गुणगान किया जाता है  । “

इस श्लोक से स्पष्ट हो जाता है की किस प्रकार वेदो भगवान कृष्ण का वर्णन कई बार हुआ है। तो चारो वेद और इतिहास भगवान श्रीकृष्ण को परम भगवान स्वीकार करते है

श्रीमदभगवत गीता जो निर्णय शास्त्र है उसमे भगवान श्रीकृष्ण स्वयं घोषणा करते है की वो ही परम भगवान है। 

इस तरह की घोषणा तीनो लोको मैं अन्य किसी देवी देवता नहीं की है।  भगवान यह घोषणा इसलिए करते है क्योकि वो जीव आत्मा का कल्याण चाहते है । इसीलिए  भगवद गीता में भगवान वो घोषणा करते है जो की तीनो लोको में किसी देवी या देवता ब्रह्मा, शिव  ने कभी नहीं की ।   

श्रीमदभगवत गीता में 7। 7 भगवान कृष्ण ने स्पष्ट कहा की

मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७।  ७ ॥

भगवान ने अर्जुन को धनञ्जय कहते हुए सम्भोदित करते है और कहते है की “हे धनञ्जय मुझसे  श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है ।  जिस परकार मोती धाए में गुथे रहते है उसकी पारकर सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है ।  

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो: ।

प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु ॥ ७। ८ ॥

— BG 7। 8

हे कुंती पुत्र मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चंद्रमा का प्रकाश हूँ, वैदिक मंत्रो में ओंकार हूँ आकाश में धव्नि हूँ तथा मनुष्य में सामर्थ्ये हूँ ।  

इस श्लोक से स्पष्ट होता है की आप जो भी भोतिक जगत में अनुभव करते हो वो सब भगवान श्री कृष्ण की ही कृपा और विस्तार है , जैसे की जल का स्वाद, सूर्ये और चंद्रमा का प्रकाश, और वैदिक मंत्रो में ओंकार है इस धवनी के जरिये योगी आत्मसाक्षात्कार करने का प्रयास करते है ।  उन्ही से यह श्रृष्टि चल रही है तथा उन्ही से हम मनुष्य के बल का स्त्रोत भी स्वयं भगवान श्री कृष्ण है।  

देवताओ की पूजा के बारे भगवान् श्री कृष्ण का सन्देश

इसके साथ साथ भगवान श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में यह भी स्पष्ट कहा है की देवी देवतो की पूजा करने वाले देव लोक में जाते है, पितरो की उपसना करने वाले पितरो के पास जाते है , भूत प्रेत की उपसना करने वाले भूत प्रेतों को प्रपात होते है लेकिन जो मेरी (भगवान कृष्ण की पूजा करते है ) पूजा करते है वो मेरे साथ निवास करते है 9.24

यज्ञ के परम भोक्ता भगवान श्री कृष्ण

आप जो भी यग करते है उसके परम भोक्ता स्वयं भगवान श्री कृष्ण है  उन्होंने 9। 24 में कहा है की “मैं ही समस्त यज्ञो को एकमात्र भोक्ता हूँ जो लोक यह नहीं जानती वो निचे गिर जाते है अर्थात उनकी गति उचतम नहीं होती बल्कि निचे के लोक जो की ज्यादतर असुरिक लोक है उसकी तरफ होती है ।  तो आपको यह जानना चाहिए की सभी यज्ञे भगवान श्री कृष्ण की संतुष्टि के लिए किये जाते है ।  

भगवद गीता के 7. 23 श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते है की जो अप्ल्बुधि वाले है वो ही देवताओ की पूजा करते है क्योकि उनसे प्राप्त फल सिमित और क्षणिक होते है ।  और 7. 22 में भगवान यह भी बताते है की आप देवताओ की पूजा करते हो और आपको किसी फल की प्राप्ति होती है तो वह वास्तव में मेरे द्वरा की जाती है । \

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।

लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ 7.22

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भ‍वत्यल्पमेधसाम् ।

देवान्देवयजो यान्ति मद्भ‍क्ता यान्ति मामपि ॥ 7। 23  

तो हमे सीधा भगवान श्रीकृष्ण की शरण लेनी चाहिए क्योकि हम अनंत देवी देवताओ की पूजा करके भी संतुष्ट नहीं हो सकते ।  भगवान श्री कृष्ण वृक्ष की जड़ के सामन है, जैसे जड़ को पानी देने से सभी पेड़ और पतों तक पानी पहुच जाता है उसी परकार भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने से सभी देवी देवता प्रसन्न हो जाते है  उनको पानी देने से ।  और भगवान कृष्ण की पूजा करने से हमें अनंत फल की प्राप्ति होती है हम उनके लोक में परवेश कर सकते है जंहा से जाकर कोई भी वापिस नहीं आता है भगवद गीता 8. 15 आब्रह्मभुवनाल्ल‍ोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुनमामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥

 इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है की उचतम लोक जैसे की स्वर्ग लोक आदि से लेकर निचे के सभी लोक पाताल लोक आदि सभी दुखो का घर है लेकिन उनके दिव्ये लोक में आने के बाद जीव आत्मा को इन दुखदायी लोको में दुबरा नहीं आना पड़ता है ।  

तो भगवान क्या आदेश है सभी जीव आत्माओ के लिए ?

 इसकी भी सुचना भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता के 9। 34 में दी है

मन्मना भव मद्भ‍क्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ॥ 9। । 34

भगवान कृष्ण कहते है अपने मन को मेरे नित्ये चिंतन में लगाओ , मेरे भक्त बनो मुझे नमस्कार करो और मेरी ही पूजा करो ।  इस प्रकार मुझमे पूर्णतया तल्लीन होने पर तुम मुझे जरुर प्राप्त करोगे ।  

तो इस तरह से भगवान् श्री कृष्ण चाहते है की हम देवी देवताओ की पूजा त्याग कर उनकी पूजा करे उनको नमस्कार करे और इसका उदहारण उन्होंने अपनी बाल लीला में किया था जब उन्होंने इंद्र की पूजा को ठुकरा कर अपने ही स्वरूप श्री गोवेर्धन पर्वत की पूजा करवाई थी ।  

जो भी भगवान् श्री कृष्ण के शरणागत है भगवान कहते है की उसको किसी भी तरह का भय नहीं होता है क्योकि वे  उसको हर प्रकार और हर पाप से से रक्षा करने का वचन देते है ।  

आज हम देखते है की कोई भी हिन्दू भगवद गीता भगवद पुराण का अध्यन नहीं करता है ।  उनका समय या तो TV पर मनोरजन करते हुए बीत जाता है या फिर फालतू की चर्चाओं में समय को बर्बाद कर देते है ।  और हिन्दू धर्म की रक्षा पर बड़े बड़े प्रवचन देते है जबकि उन्हें यह पता ही नहीं भगवान कौन है ।  हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए सबसे पहले हमें आचार्यो की शरण लेनी होगी जिन्होंने परमपरा से ज्ञान को आगे बढया है ।  जैसे की मध्वाचार्ये , रामानुचाजर्ये , निम्बार्क्चय्रे ,चैतन्यमहाप्रभु और श्रील A। C। Bhaktivadenta Swami Prabhupaad   जैसे जगत गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए तभी  शंकराचार्य जी का यह कथन जो की उन्होंने गीता महाताम्ये में कहा है सच साबित होगा

ekaṁ śāstraṁ devakī-putra-gītam
eko devo devakī-putra eva
eko mantras tasya nāmāni yāni
karmāpy ekaṁ tasya devasya sevā

एकम शास्त्रम देवकी पुत्र-गीतं

एको देवो देवकी-पुत्रा एव

एको मंत्रह तस्य नामानि यानी

कर्मप्ये एकम तस्य देवस्य सेवा

 गीता महाताम्ये 7

आज के युग में लोक एक शाश्त्र , एक इश्वर , एक धर्म तथा एक वृति के लिए अत्यंत उत्सुक है अतएव केवल  एक शाश्त्र पर ध्यान दो जो की देवकी पुत्रगीतं यानी की भगवद गीता, जो की सारे विश्व के लिए हो , और वही देवकी पुत्र सब का इश्वर हो , और सभी एक मन्त्र जपे उनका कीर्तन करे यानी की – हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे , हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।  

अगर सनातन धर्म की रक्षा करनी है तो हमे परम्परागत आचार्यो से ही शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए और इसका का पालन करना चाहिए । श्रील प्रभुपाद एक ऐसे संत है जिन्होंने देश विदेश में कृष्ण भक्ति का प्रचार किया है  ।  उनके द्वरा लिखी पुस्तको से पुरे विश्व भर में हजारो की सख्यां में लोग कृष्ण भक्ति से जुड़ रहे है  ।  आप भी उनके पुस्तको खरीद सकते है अगर ऐसा संभव नहीं है तो इस वेबसाइट को बुकमार्क कर सकते है यंहा पर हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषा में आपको श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं पर आधारित लेख पब्लिश करते है  ।  

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