क्या धर्म के नाम पर हिंसा जायज है ?

‘क्या धर्म के नाम पर हिंसा जायज है ?’ जब यह प्रश्न किसी से पूछा जाता है तो लगभग सभी का जवाब एक ही होता है की नहीं, पर अगर इसका जवाब निश्चित ही “नहीं” ही होता तो हमें इस लेख को लिखने मेँ समय नष्ट नहीं करना पड़ता।

तो आईये पहले हम यह समझने का प्रयास करते है की आखिर इस प्रश्न के उत्तर को जानने की आवश्यकता ही क्या है ? क्यूंकि अधिकतर यह देखा और समझा जाता है की आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है मतलब की जबतक हमें किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती हम उस कार्य को करने की जरा सी भी कोशिश नहीं करते है ।

हम आज जिस समाज में रहे है वहां आज अधिकतर लोगो के लिए लिए सब से अनसुलझा एक ऐसा प्रश्न हे जो सबको लगता हे की उसे पता है चाहे वो एक रास्ते का भिखारी हो या इस पृथ्वी का सबसे बड़ा नेता या कोई बड़ा वैज्ञानिक। इन सबको लगता है की “मेँ धर्म के विषय मेँ सब जानता हूँ”
भले ही किसी को चाहे अपने वास्तविक माता, पिता के विषय मेँ ना पता हो पर धर्म के विषय मेँ सबका ज्ञान कोटि समुन्द्र जितना विशाल हो जाता है ।

और ऐसी परिस्थिति मे हम देखते हे की, इस संसार मेँ जितने प्रकार के लोग उतने प्रकार के धर्मो का अस्तित्व है। और सभी ने अपनी इक्छाओ के अनुसार धर्म की परिभाषा बना रखी है। एक उदाहरण से समझते है- जैसे किसी व्यक्ति को लड़ाई झगड़ा पसंद नहीं है तो उसके लिए अहिंसा परमो धर्म वाक्य ही सब कुछ है जैसे की महात्मा गांधी। दूसरी तरफ जिसको लड़ने झगड़ने मेँ रूचि होती हे वो अपने हक को लड़ झगड़ कर लेने मेँ रूचि रखते है जैसे की भगत सिंह और कईओ को तो दोनों मेँ रूचि लगने लगती हे समय समय को देखकर कर।

अब ज़ब लोगो मेँ इतनी विभिन्नता अपने घर पर ही दिखती हे की किसी को कुछ पसंद हे तो किसी को कुछ और, तो हम देखते है की अपने घर पर ही इतनी विभिन्नता है तो पुरे विश्व की विभिन्नता का समायोजन करना नामुमकिन है। लेकिन फिर भी कई कारणवश हम सब अपने अपने विचार को एक दूसरे पर थोपने का प्रयास करते हे और नतीजा सब के सामने है जहा कहीं भी एक विचारों वाले व्यक्ति ज्यादा होने लगते है तो वो उन दूसरे विचारों वाले व्यक्ति जिनकी संख्या कम होती हे उस पर हावी होते देर नहीं लगाते है।

जबकि वास्तविकता तो यह है की जब तक कोई भी विचार मन गढ़ंत होगा उसका हश्र तिरष्कार के रूप मेँ ही होगा और हमने अपने मन गढ़ंत विचारों को ही धर्म समझते है। और मन गड़ंत विचारों से औत -प्रोत हो कर अन्य लोगो को धर्म समझा रहे है साथ ही साथ एक दूसरे दूसरे को ऊँचा या निचा दिखाने मेँ जुटे हुए है।

परन्तु क्या कोई भी व्यक्ति आखिर वास्तविक धर्म क्या है इसको जाने बगैर ज्ञान कैसे बाट सकता हे इसी के परिणाम स्वरूप हम देख रहे हे की आने वाली पीढ़ी धर्म के नाम से नफरत करने लगी हे जिसका एकमात्र कारण हमारा धर्म के प्रति आधा अधूरा ज्ञान हे अब आप पूछ सकते हो की चलो आप बताओ की धर्म आखिर है क्या?

तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा की धर्म कभी परिवर्तनीय नहीं होता जिस प्रकार इस भूमंडल पर सूर्य, चाँद, हवा, पानी अग्नि की आवश्यकता सब को है वैसे ही धर्म की आवश्यकता है कोई बिना धर्म के जीवित नहीं रह सकते और जिस प्रकार आग का धर्म जलाना हे बिना तपिश के आग आग नहीं हो सकती और पानी का धर्म तरलता है तथा बिना तरलता के पानी पानी नहीं हो सकता है। उसी तरह से नमक का धर्म नमकीन होना है , अगर नमक नमकीन नहीं है तो फिर वो नमक नहीं हो सकता, ठीक इसी प्रकार इस पृथ्वी पर सभी जीवों का एक ही धर्म है और वो है सेवा करना।

और हम देखते है की कोई कुछ भी हो पर उसके अंदर सेवा भाव अवश्य होता हे यही सेवा भाव जीव का वास्तविक धर्म है, आप देख भी सकते है की आज इस कोरोना काल मेँ लोग एक दूसरे की सेवा के लिए कितने आतुर हे चाहे वो किसी भी जाती का क्यूँ ना हो यहाँ तक की लोग आवारा कुत्ते, बिल्ली, चींटी, कबूतर इन तक की सेवा करने को तैयार रहते है। तो किसी के मन मेँ यह विचार आ सकता हे की मेँ तो किसी की सेवा नही कर रहा तो वो भी गलत धारणा ही है। क्योकि हर व्यक्त सेवा मेँ रत हे उदाहरणतः कोई देश सेवा, कोई समाज सेवा कोई माता पिता की सेवा, तो कोई अपनी बीवी बच्चो की सेवा तो कर ही रहा हे और अगर कोई कहे नहीं मेँ इन मेँ से कुछ भी सेवा नहीं कर रहा तो जनाब आप अपनी इन्द्रियों की सेवा तो कर ही रहे हो इस सेवा को तो कोई इंकार नहीं कर सकता।

अब ज़ब सेवा ही हमारा धर्म हे तो फिर इतने लड़ाई झगडे क्यूँ इसका कारण हे की हम सब सेवा कर तो रहे हे पर अपने अपने मनोधर्म से प्रभावित होकर कर रहे है। जिस प्रकार एक पेड़ को सींचने के लिए हमें जल अलग अलग पत्तियों की बजाये जड़ मेँ डालना सर्वोत्तम रहेगा जड़ से जल हर पत्ती तक आसानी से पहुंच जायेगा, और पत्तियों मे विशेष रूप से अलग से कोई जल डालने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

जिस प्रकार हम अपने मुंह के द्वारा भोजन ग्रहण करके पुरे शरीर को पोषित कर लेते है तथा अलग से हाँथ या पाँव को खिलाने की आवश्यकता नहीं होती इसी प्रकार यदि हम सब अपनी सारी सेवाओं के लिए एक मात्र भगवान कृष्ण की शरण ग्रहण करें तो हम सारी कठिनाइयों से छुटकारा पा सकते हे और कम समय मेँ हर जीव की सेवा करके अपने वास्तविक धर्म कृष्ण भक्ति के धर्म का पालन कर सकते हे जो की शास्त्र सम्मत हे किसी साधारण जीव की मनोकल्पना नहीं है।

अब हम अपने प्रश्न का जवाब की धर्म मे हिंसा जायज हे की नहीं पर आते हे अभी तक तो हम वास्तविक धर्म की परिभाषा को ही समझ रहे थे। अगर सभी धर्म के लोग अपने धर्म यानी की मानवता की सेवा भगवान् कृष्ण जिनको ईसाई गॉड , मुस्लिम अल्लाह के रूप में जानते है को केंद्र रख के करे तो हिंसा का सवाल ही पैदा नहीं होता है. धर्म का अर्थ है लोगो को परम् भगवान कृष्ण यानी ईश्वर अल्ल्हा के की प्रेम पूर्वक सेवा में लगाना। सनातन धर्म सभी विचारो का समावेश करता है लेकिन फिर भी अपना मूल अस्तित्व बनाये रखता है। जंहा दूसरे धर्म भगवान निराकार है या साकार इस पर हिंसा पर उतारू हो जाते है वंही सनातन धर्म बताता है भगवान इन तीनो रूप में स्तिथ है। उसके भक्त उनको अपनी योग्तया के आधार पर तीनो रूप प्राप्त कर सकते है। लेकिन जो उच्चतम श्रेणी के भक्त है वो जानते है की भगवान अंततः साकार रूप में पाने धाम गोलोक मैं निवास करते है जो की न तो सूर्ये से प्रकाशित होता है न ही चन्द्रमा से या बिजली से, और वंहा पर जो भी जाता है वो सभी प्रकार के कलेश जैसी की बीमारी , मृत्यु बुढ़ापा जन्म से मुक्ति पाता है और फिर कभी वापिस इस संसार मैं नहीं आता है। लेकिन अगर मनगंढ़त धर्म से समाज मैं असंतोष फैलता है और शान्ति की स्थापना की आवश्यकता पड़ती है तो भगवान स्वयं धरती पर बार बार अवतरित होते है और असुरो को विनाश करते है। लेकिन यह हिंसा हिंसा नहीं होती क्योकि ये जगत के कल्याण के लिए होती है। असुरो की गयी शांति संधि वास्तव मैं हिंसा होती है।

लेकिन कलियुग मैं सबसे बड़ा शस्त्र है हरी नाम शस्त्र जिसके कीर्तन और प्रचार से हम मनोधर्म का विनाश कर सकते है इसके लिए ही चैतन्य महाप्रभु ने हरे कृष्ण संकीर्तन आंदोलन को शरू किया। और आज हम देख रहे जो भी भक्त इस्कॉन से जुड़े है वो शान्ति प्रिये स्थिति मैं रह कर विश्व कल्याण के लिए सभी को हरे कृष्ण आंदलोन से जोड़ रहे है जिसे की सभी झगह वास्तिविक शान्ति और भाईचारे की स्थापना हो सके। तो कलियुग के वर्तमान समय मेँ भगवान की सेवा संकीर्तन यज्ञ और हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। के जपके माध्यम से होती हे और इसी से कलह निर्वृति की प्राप्ति भी होती है

हरे कृष्ण

वामन रूप दास

लेखक परिचय
वामन रूप दास परम पूज्य गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज जी से दीक्षित है और इस्कॉन रोहिणी में कई महत्वपूर्ण सेवाओं मैं उत्साह पूर्वक भाग लेते है।

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