अगर ऐसा हुआ तो हिन्दू धर्म की रक्षा कौन करेगा ?

आज हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिए चारो तरफ हाहाकार मचा है . भारत वर्ष के हिन्दू अपने धर्म की रक्षा को लेकर अत्यंत चिंतित है एवं भयभीत है . एक ४ फूट का आमिर खान उनके सामने थोड़े से प्रश्न खड़े करता है तो शाश्त्र मति न होने के कारण उनके मुह से श्लोक के बजाये सिर्फ ‘गर्व से कहो हम हिन्दू है निकलता है’ हर तरफ नफरत की धुध इतनी गहरी है की हिन्दू धर्म के ठेकदार बने लोग ये भूल चुके है की धर्म की रक्षा के लिए धर्म में विश्वाश होना जरूरी है न किसी दुसरे धर्म के व्यक्ति से नफरत .  वे गर्व से कहो हिन्दू बोल बोल कर ये भूल चुके है की वो हिन्दू है ही नहीं हिन्दू तो सिर्फ एक नाम है जो की उनको विदशी आक्रमणकारियों ने दिया था .  जो लोग सोचते है की दुसरे धर्म से नफरत कर के वो अपने धर्म की रक्षा कर रहे है तो ऐसी सोच बिलकुल गलत है. धर्म की रक्षा धर्म से की जाती है यानी की धर्म को जान कर की जाती है किसी अन्य धर्म से नफरत कर के नहीं .  कल को इसाई आप से पूछे? की आप कौन है? आपके भगवान् भगवान कौन है और आप इतने सारे भगवान् की पूजा क्यों करते है तो आपके पास इन सब के जवाब होने चाहिए . अगर आपके साधू, बलात्कारी,  अहंकारी और चोर क्यों साबित हो रहे है ? क्या ये सब हिन्दू धर्म के खिलाफ साजिश है या फिर हिन्दू धर्म के मानने वालो के लिए एक प्रश्न चिन्ह की हिन्दू धर्म की हानि इस तरह से दिन पर दिन क्यों होती जा रही है ? इसके लिए सबसे पहले तो ये जानना होगा की हम हिन्दू नहीं है! इन सब प्रश्न के उत्तर के लिए इस लिंक पर क्लिक करे (Who is Supreme)

  “हिन्दू के नाम से पासपोर्ट जरुर बनवाये लेकिन दिल से सदा सनातन धर्मी रहे”

तो सबसे पहेले तो ये जानना होगा की हम सब का धर्म  दिव्ये वर्णाश्रम धर्म है या फिर सनातन धर्म है . दिव्ये वर्णाश्रम धर्म में जन्म से जाती प्रथा नहीं है बल्कि वर्णाश्रम का यह सिद्धांत   गुण और कर्म पर आधारित है . इस धर्म का पालन करते हुए कोई भी व्यक्ति वह चाहे शुद्र हो , स्त्री हो , ब्राह्मण हो , क्षत्रिये हो या फिर वैश्य हो? वह जीवन का महानतम उद्श्ये प्राप्त कर सकता है . जीवन का उदेश्ये है यह जानना की हम सब सनातन जीव है हमारा न ही कोई आदि है और न ही कोई अंत है , हम यह शरीर नहीं बल्कि एक आत्मा है . और परमपिता परमेशवर भगवान श्री कृष्ण से हमारा  एक दिव्ये सनातन रिलेशनशिप है .

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: ।

मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ BG 15.7

भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में अर्जुन से कहा की सभी जीव उन्ही के नित्ये अंश है और इस भोतिक जगत  अपने मन और ६ इन्द्रियों से लिप्त हो कर संगर्ष कर रहे है

अत: सभी जीव भगवान के अंश होने के कारण उनका उनसे विष्ट समभंद है वास्तव में जीव भोतिक प्रक्रति के परभाव में आकर भोतिक वस्तुओ की सेवा में लिप्त है जैसे की माँ अपने बच्चे की सेवा करती है , बच्चा अपने पिता की , पिता अपनी पत्नी और बच्चो की सेवा करता है ऐसे ही पुरे जगत में सभी किसी न किसी के सेवा कर रहे है लेकिन यह सेवा नित्ये नहीं होने के कारण और केवल शाररिक अस्त से जुडी होने के कारण वो अनंत काल से संगर्ष युक्त है अगर जीव भगवान् के उन्मुख हो जाए और भगवान की सेवा करे तो वह अपने नित्ये सवरूप को जान कर हमेशा के लिए जन्म मृत्यु बुढ़ापे बीमारी से मुक्त हो कर भगवान के धाम में जा कर उनके साथ नित्ये सेवा में युक्त हो सकते, क्योकि भगवान सनातन है जीव भी सनातन है, इसलिए हम सब सनातन धर्मी है .

हिन्दू धर्म के संभावित विनाश का कारण   

हिन्दू धर्म के विनाश चाहे हो जाए पर सनातन तो नित्ये है उसका विनाश असभव है . हिन्दू धर्म का विनाश इस लिए हो जायेगा क्योकि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए टीवी , यु-ट्यूब पर चिल्लाने वाले लोग कभी भी शाश्त्र अधयन्न नहीं करते है . आप से अच्छे वो मुसलमान है और वो इसाई है जो की वेदों का अध्यन करते है बेशक से उनका उद्श्ये सिर्फ हिन्दू जनता को भटकाना ही होता है . वेदों में सबसे ऊँचा स्थान रखने वाली भगवद गीता ऐसे तथाकथित हिन्दूओ की शेल्फ, किस रैंक, दीवार पर एक कौने में बने मंदिर के अंदर धुल खा रही होती है . 

शाश्त्रो से दुरी एवं उनमे विश्वाश न होने के कारण एक हिन्दू समाज का वर्ग तो हमेशा अपनी पूजा पधतियो को विज्ञानिक आधार देने पर लगा रहता है . इसका स्पष्ट अर्थ यह है की  इन सब को आधुनिक भोतिक विज्ञानिको की अपूर्ण इन्द्रियों पर ज्यादा विश्वाश है और शाश्त्रो पर विश्वाश नहीं है . इसलिए ये सब हर रोज यह रीजन देते रहते है की तुलसी की पूजा इस लिए नहीं करते की तुलसी भगवान कृष्ण की भक्त और उनकी प्रिय है बल्कि इस लिए करते है क्योकि तुलसी में औषधीय गुण है ?  इसी तरह से अंग्रजो और मुस्लिमो से परभावित हो कर उनके सामने घुटने टेक कर इन लोगो ने यह भी स्वीकार कर लिया की भगवान निराकार होते है जब की भगवान् के तीनो रूप है –

वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वम् यज्ज्ञानमद्वयम् । ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्द्यते   SB  1.2.11

उपरोक्त श्लोक का अर्थ है की जो सत्य जानता है उसको ज्ञान है की सत्य क्रमश: ब्रह्म, परमात्मा, और भगवान के नाम से पुकारते है,  ब्रह्म यानी की निरकार जो की भगवान् के दिव्ये शरीर से निकला अधुभुत प्रकाश है , परमात्मा रूप में  वो सभी के हृदये में विराजित है और साकार रूप में  वो भगवान वृन्दावन में अपने भक्तो के साथ नित्ये रूप से निवास करते है. तो भगवान तीनो है निराकार, परमात्मा के रूप में हमारे हृदये में और स्वयं साकार भगवान के रूप में अपने दिव्ये धाम में इसकी पुष्टि भगवद गीता के 15.6 में परम भगवान श्रीकृष्ण ने की

न तद्भ‍ासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक: ।

यद्ग‍त्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ 15.6 ॥

उपरोक्त श्लोक में भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट रूप में अपने लोक का वर्णन कर रहे है की उनका लोक न तो सूर्ये से प्रकाशित होता है न ही अग्नि या फिर बिजली से. उनके धाम अगर कोई पहुच जाता है तो फिर वो इस जगत में कभी वापिस नहीं आता है. 

तो इससे पता चलता है जैसी की ये नष्ट होने वाला अनित्ये भोतिक जगत है ऐसे ही भगवान का सनातन धाम है . सभी जीव आत्मा का परम उद्श्ये है अपने इस धाम को वापिस जाना .. इस से स्पष्ट हो जाता है की भगवान साकार है लेकिन बिना किसी परम्परा के अनुगत हो कर किये जाने वाले शाश्त्र अध्यन से मनुष्य की मति भर्मित हो जाती है .

हमें अपने शास्त्रों के अंदर वर्णित शिक्षाओ को यथा रूप श्रधा के साथ ग्रहण करना चाहिए . लेकिन आज धर्म को आधुनिक विज्ञान के लॉजिक के साथ जोड़ कर धर्म में वर्णित कार्यो का स्पष्टीकरण करनी के कोशिश की जा रही है . वो ही विज्ञान जो की अपनी ही व्यखाओ को समय समय पर बदलता रहता है . आज से कुछ वर्ष पूर्व मेडिकल साइंस बोलती थी की बच्चे गर्भ में सुन नहीं सकते है . लेकिन आज वो कहती है गर्भ में बच्चे सुन लेते है, और उनके मस्तिक्ष के विकास पर घर के वातावरण का परभाव पडता है यह सब का वर्णन श्रीमद भागवतम में पांच हजार वर्ष पूर्व आया है . तो सिर्फ भोतिक विज्ञान जो की उन लोगो द्वरा रचा गया जिनकी खुद की इन्द्रिया अपूर्ण है उन को संतुष्ट करने के लिए हमें अपने वैदिक शाश्त्रो में बदलाव लाने की आवश्यकता नहीं है .

हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए आज सोशल मीडिया, व्हाट्स ग्रुप बनाने से कुछ नहीं होगा. अगर हिन्दू धर्म की रक्षा करनी है तो युवाओ को किसी परम्परा से अधिकृत साधू की शरण में जाना होगा . उसके निर्देशों में शाश्त्रो को समझ कर पहले अपना जीवन बदलना होगा फिर दुसरे के जीवन को बदलने के प्रयासरत होना होगा इस तरह से अगर आप अपने देश के नागरिको का कल्याण चाहते है तो आपको कृष्ण को तत्व से जानकर अन्य सभी धर्म को त्याग कर केवल परम पिता परमेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत हो कर उनकी की शिक्षाऔ का प्रचार करना होगा . अगर आप इसके बारे में और जानना चाहते है तो हमे लिखे akincanadas01@gmail.com

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